इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में दायर एक जनहित याचिका में आधार‑आधारित ड्राइविंग और सीखने के लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया को चुनौती दी है। याचिकाकर्ता का दावा है कि कुछ लाइसेंस मृत व्यक्तियों के आधार नंबर से और आपत्तिजनक तस्वीर के साथ जारी किए गए, जिससे नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। न्यायालय ने इस मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए केंद्र तथा उत्तर प्रदेश सरकार से लिखित उत्तर देने का आदेश दिया है।
यह विवाद ओडिशा में आधार को पेंशन योजनाओं से जोड़ने के बाद उत्पन्न हुई बहस से जुड़ा है, जहाँ कई लाभार्थियों को आधार न होने के कारण बाहर रखा गया था। उसी तरह कटक के नाम परिवर्तन के बाद भूमि अभिलेख और रेलवे स्टेशन के नामों में आधार डेटा के मिलान में कठिनाइयाँ सामने आईं। इन पूर्व घटनाओं ने आधार‑आधारित सेवाओं में डेटा की शुद्धता और सुरक्षा को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं।
अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय का यह आदेश केंद्र और राज्य सरकार को आधार‑आधारित लाइसेंस प्रणाली की कार्यप्रणाली, डेटा सत्यापन प्रक्रिया और संभावित दुरुपयोग को रोकने के उपायों पर विस्तृत स्पष्टीकरण देने के लिए बाध्य करता है। यदि सरकार उचित उत्तर नहीं देती है तो न्यायालय संभावित रूप से इस प्रणाली को अस्थायी रूप से रोक सकता है या सुधारात्मक निर्देश जारी कर सकता है। यह कदम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और डिजिटल पहचान के दुरुपयोग को रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण precedent स्थापित कर सकता है।

