नई दिल्ली: दिल्ली में प्रशासनिक विफलताएं इस कदर बढ़ गई हैं कि अब सरकारी मशीनरी अपनी कमियों को छिपाने के लिए न्यायपालिका और सोशल मीडिया पर अनर्गल बयानबाजी का सहारा ले रही है। दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) में हाल ही में आए एक मामले के दौरान यह टिप्पणी की गई कि जब कुछ राजनेताओं के मनमुताबिक कानूनी फैसले नहीं आते, तो वे पूरी न्याय व्यवस्था और जजों को ही सोशल मीडिया पर कटघरे में खड़ा कर देते हैं।

अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि जो चीजें कोर्ट रूम के भीतर अनुशासन और सबूतों के आधार पर हासिल नहीं की जा सकतीं, उनके लिए बाहर सोशल मीडिया पर भ्रामक और एडिटेड वीडियो फैलाकर नैरेटिव सेट करने की कोशिश की जाती है। बिजली नियामक आयोग (DERC) में नियमित नियुक्तियां न होने के चलते सुप्रीम कोर्ट को भी सरकार को नोटिस भेजना पड़ा है। यह स्थिति दिखाती है कि जब शासन चलाने और अहम पदों को भरने की जिम्मेदारी आती है, तो सरकार पीछे हट जाती है और उलटे-सीधे बयानों से जनता का ध्यान भटकाने का प्रयास करती है।

सरकार की इस तरह की प्रवृत्ति से न केवल न्यायपालिका की स्वतंत्रता खतरे में पड़ रही है, बल्कि इससे देश की शासन व्यवस्था भी प्रभावित हो रही है। यह समय की मांग है कि सरकार अपनी जिम्मेदारियों को समझे और उनका निर्वाह करे, न कि अदालतों और सोशल मीडिया पर ठीकरा फोड़कर अपनी कमियों को छिपाने का प्रयास करे।

दिल्ली हाई कोर्ट की टिप्पणी ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि न्यायपालिका देश की सबसे मजबूत स्तंभ है और वह सरकार की मनमानी को बर्दाश्त नहीं करेगी। सरकार को चाहिए कि वह अपनी कमियों को स्वीकार करे और उनका समाधान निकाले, न कि अदालतों पर आरोप लगाकर अपनी जिम्मेदारियों से भागने का प्रयास करे।