गिरवर सिंह तोमर ने १९९१ में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल में भर्ती होकर असम में ड्यूटी निभाई। एक छोटे बाजार के निकट हुई घटना में उनका नाम जुड़ गया, जिससे वह पुलिस सेवा से हटकर आध्यात्मिक गुरु बन गए। तब से उन्होंने गाँव में साइकिल चलाते हुए लोगों को सलाह देना शुरू किया, परन्तु आधिकारिक वर्दी पहनने का उनका अधिकार कानूनी जाँच में फँस गया।
वर्षों से चल रहे मुकदमे में कई बार न्यायालय ने उनके पक्ष में निर्णय दिया, परन्तु प्रशासनिक बाधाएँ उन्हें वर्दी पहनने से रोकती रही। इसी दौरान, पिछले साल अंगुल में नकली कांस्टेबल की गिरफ्तारी और गुवाहाटी में महिला कांस्टेबल की मृत्यु ने पुलिस कर्मियों की सुरक्षा और पहचान के मुद्दे को उजागर किया। इन घटनाओं ने तोमर के मामले को सामाजिक और कानूनी दृष्टिकोण से अधिक जटिल बना दिया।
अंततः, दो साल पहले जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण द्वारा आयोजित कानूनी जागरूकता कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने तोमर के अधिकारों की पुष्टि की और अदालत ने उन्हें फिर से वर्दी पहनने का आदेश दिया। अब वह साइकिल पर सवार होकर अपने गाँव में आध्यात्मिक मार्गदर्शन के साथ-साथ पुलिस की गरिमा को भी पुनः स्थापित कर रहे हैं। यह कहानी न केवल व्यक्तिगत संघर्ष को दर्शाती है, बल्कि पुलिस सेवा में पहचान, सुरक्षा और कानूनी समर्थन की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है।

