पेरियार और अंबेडकर दोनों ने सामाजिक असमानताओं के खिलाफ संघर्ष में जिन्ना के विचारों को अपनाया और मुस्लिम समुदाय को ‘मुक्ति दिवस’ मनाने का आह्वान किया। इस आह्वान का उद्देश्य भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधीन रहने वाले विभिन्न वर्गों को एकजुट करना और सामुदायिक विभाजन को कम करना था। जिन्ना ने इस प्रस्ताव को समर्थन दिया, जिससे एक व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन का रूप ले लिया।

इस सहयोग की पृष्ठभूमि में 1930 के दशक की सामाजिक उथल-पुथल और स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न चरण शामिल थे। पेरियार ने दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया, जबकि अंबेडकर ने संविधान निर्माण में समानता के सिद्धांतों को स्थापित किया। जिन्ना ने अपने मुस्लिम लीग के माध्यम से इस विचारधारा को राष्ट्रीय स्तर पर फैलाया, जिससे विभिन्न समुदायों के बीच संवाद की नई राह खुली।

आज के समय में इस ऐतिहासिक गठबंधन की सीख कई सामाजिक मुद्दों में प्रासंगिक है। हाल ही में राइट्स के 175 करोड़ रुपये के बड़े परामर्श आदेश और कराची में मातृ स्वास्थ्य की चुनौतियों ने सामाजिक न्याय के प्रश्न को फिर से उठाया है। इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि पेरियार, अंबेडकर और जिन्ना के विचार आज भी समानता, एकता और सामाजिक सुधार के मार्गदर्शक बने हुए हैं।