ऑस्ट्रेलिया के डिजिटल देखभाल कर्तव्य विधेयक के तहत सोशल मीडिया कंपनियों को उपयोगकर्ताओं को एल्गोरिद्म‑आधारित फ़ीड से बाहर निकलने का विकल्प देना अनिवार्य किया जाएगा। यह प्रस्ताव पिछले सप्ताह सरकार द्वारा किशोर उपयोगकर्ताओं पर जुर्माने दोगुना करने और न्यूनतम आयु सीमा तय करने के बाद आया है, जिससे ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर सार्वजनिक दबाव बढ़ा है। इस संदर्भ में यूके ने भी समान आयु प्रतिबंध लागू किए हैं, जबकि बड़ी तकनीकी कंपनियां वैश्विक स्तर पर इन नियमों का विरोध कर रही हैं।

यदि यह नियम लागू हो जाता है, तो उपयोगकर्ता अपनी फ़ीड को केवल मित्रों की पोस्ट तक सीमित कर सकते हैं, जिससे निरंतर स्क्रॉलिंग और अनचाहे विज्ञापनों से बचाव संभव होगा। लेकिन कंपनियां तकनीकी उपायों से इस विकल्प को जटिल बना सकती हैं या उपयोगकर्ता अनुभव को प्रभावित करने वाले अन्य तरीकों से प्रतिबंध को दरकिनार कर सकती हैं। इस कारण सरकार को क़ानून में स्पष्ट प्रवर्तन प्रावधान जोड़ने की आवश्यकता होगी, ताकि कंपनियां केवल औपचारिक रूप से ही नहीं, बल्कि वास्तविक रूप से भी इस विकल्प को लागू करें।

इस पहल का महत्व तभी स्पष्ट होगा जब इसे पिछले घटनाओं के साथ जोड़ा जाए, जैसे कि ओडिशा के भुवनेश्वर में एक नाबालिग लड़की के साथ सोशल मीडिया पर मित्रता के बाद हुए अत्याचार की घटना, जिसने ऑनलाइन सुरक्षा की कमी को उजागर किया। ऐसी घटनाएं दर्शाती हैं कि केवल आयु प्रतिबंध पर्याप्त नहीं, बल्कि उपयोगकर्ता को अपनी फ़ीड चुनने का अधिकार भी आवश्यक है। यदि सरकार इस विधेयक को सफलतापूर्वक लागू कर लेती है, तो यह न केवल ऑस्ट्रेलिया में बल्कि विश्व स्तर पर डिजिटल सुरक्षा के मानकों को ऊँचा कर सकता है।