कानपुर: उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक मोर्चे पर केवल बयानों और बैठकों का दौर जारी है। सरकार जहां एक तरफ बड़े वैश्विक निवेशक सम्मेलनों और 'ग्लोबल ग्रोथ' के जरिए राज्य की बदलती तस्वीर का दावा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर नागरिक सुविधाएं हाशिए पर हैं। कस्बों और मोहल्लों की टूटी सड़कें, जलभराव और लचर स्वास्थ्य व्यवस्था पर बात करने के बजाय नेता केवल बड़े आंकड़ों की बाजीगरी में उलझे हुए हैं।
हाल ही में समाप्त हुए पंचायत कार्यकालों के बाद ग्राम प्रधानों को ही प्रशासनिक जिम्मेदारी सौंपने के फैसले पर भी सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि सरकार स्थानीय चुनाव समय पर कराने और नई व्यवस्था लागू करने में पूरी तरह नाकाम रही है, जिससे ग्रामीण विकास से जुड़े नीतिगत फैसले अधर में लटके हुए हैं। जब भी जनता जवाब मांगती है, तो प्रशासन वैश्विक उपलब्धियों का हवाला देकर अपनी स्थानीय विफलताओं से पल्ला झाड़ लेता है।
उत्तर प्रदेश की जनता अब सिर्फ बड़े-बड़े दावों से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर हो रहे विकास कार्यों से ही संतुष्ट होगी। सरकार को चाहिए कि वह अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए ठोस कदम उठाए और नागरिक सुविधाओं को बेहतर बनाने पर ध्यान दे।
इस मामले में सरकार को अपनी प्राथमिकताएं तय करनी होंगी और सुनिश्चित करना होगा कि विकास कार्यों का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचे। सिर्फ बयानों और बैठकों से कुछ नहीं होगा, जमीनी स्तर पर काम करने की जरूरत है।

