प्रयागराज। उत्तर प्रदेश की पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की हालिया टिप्पणी ने शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि राज्य में कई अधिकारी संविधान की बजाय सत्ताधारी व्यवस्था के प्रति अधिक वफादार दिखाई देते हैं। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब ट्रांसफर, पोस्टिंग और प्रशासनिक फैसलों को लेकर लगातार राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप लगते रहे हैं।
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि प्रदेश की प्रशासनिक मशीनरी में राजनीतिक दखल गहराई तक पहुंच चुका है। अदालत ने यह भी कहा कि अधिकारियों की पोस्टिंग और प्रमोशन कई बार योग्यता के बजाय राजनीतिक समीकरणों से प्रभावित दिखाई देते हैं।
"संविधान नहीं, सत्ता को खुश करने की होड़?"
हाईकोर्ट की टिप्पणी का सबसे चर्चित हिस्सा वह रहा जिसमें कहा गया कि कई अधिकारी अपने निर्णय इस आधार पर लेते हैं कि राजनीतिक नेतृत्व क्या चाहता है। अदालत ने संकेत दिया कि ट्रांसफर-पोस्टिंग की संस्कृति ने प्रशासनिक निष्पक्षता को कमजोर किया है।
कोर्ट के अनुसार, स्वतंत्र और निष्पक्ष रवैया अपनाने वाले अधिकारियों को अक्सर कम महत्वपूर्ण पदों पर भेज दिया जाता है, जबकि सत्ता के करीबी माने जाने वाले अधिकारियों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलती हैं। इस व्यवस्था का सीधा असर कानून-व्यवस्था और जनता के भरोसे पर पड़ता है।
कानून का राज या राजनीतिक प्रभाव?
अदालत ने कहा कि संविधान आधारित शासन व्यवस्था किसी व्यक्ति, दल या राजनीतिक सुविधा की बंधक नहीं बन सकती। राज्य की पूरी मशीनरी की जवाबदेही संविधान और कानून के प्रति होनी चाहिए, न कि किसी सरकार या राजनीतिक दल के प्रति।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रशासनिक फैसलों में राजनीतिक प्रभाव हावी होता है तो निष्पक्ष जांच, कानून का समान अनुपालन और नागरिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
नौकरशाही पर बड़ा सवाल
हाईकोर्ट की टिप्पणी ने एक बार फिर उस बहस को जिंदा कर दिया है कि क्या भारत की नौकरशाही वास्तव में राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर काम कर पा रही है? क्या ट्रांसफर-पोस्टिंग का तंत्र प्रशासनिक सुधार की जरूरत रखता है? और क्या ईमानदार व स्वतंत्र अधिकारियों को पर्याप्त संरक्षण मिल रहा है?
इन सवालों के जवाब सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं।
जनता की नजर अब सरकार पर
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी के बाद राजनीतिक गलियारों से लेकर प्रशासनिक महकमे तक चर्चा तेज हो गई है। अब नजर इस बात पर है कि सरकार और संबंधित विभाग इन टिप्पणियों को किस रूप में लेते हैं और प्रशासनिक पारदर्शिता तथा जवाबदेही बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।
