नई दिल्ली: भारत में जहाँ एक छोटे से छोटे व्यापार, सामाजिक संगठन (NGO), ट्रस्ट या किसी भी सेवा प्रदाता संस्थान के लिए सरकार के पास पंजीकरण (Registration) कराना, पैन कार्ड लेना और अपनी आय-व्यय का ऑडिटेड हिसाब देना अनिवार्य है, वहीं देश का सबसे बड़ा और प्रभावशाली संगठन होने का दावा करने वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) आज लगभग एक सदी बाद भी एक गैर-पंजीकृत संस्था के रूप में काम कर रहा है।
हाल ही में कर्नाटक सरकार की ओर से आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर संगठन की कानूनी स्थिति, फंडिंग के स्रोतों और कर अनुपालन (Tax Compliance) का ब्योरा मांगे जाने के बाद, देश में इस 'कानूनी और वित्तीय ग्रे-ज़ोन' को लेकर तीखी बहस और आलोचना शुरू हो गई है। आलोचकों और विपक्षी दलों का सीधा आरोप है कि जब देश का आम नागरिक और छोटे संगठन नियमों के कड़े दायरे में बंधे हैं, तो आरएसएस को इस पारदर्शिता से छूट क्यों मिलनी चाहिए?
🔍 विश्लेषणात्मक आलोचना: समानता के अधिकार और पारदर्शिता पर गहरी चोट
इस पूरे मुद्दे का गहराई से विश्लेषण करने पर कई ऐसे गंभीर और विचारणीय बिंदु सामने आते हैं जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में संगठन की जवाबदेही को कटघरे में खड़े करते हैं:
1. आम नागरिक बनाम शक्तिशाली संगठन: दोहरे मानदंड का आरोप
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 सभी के लिए समानता की बात करता है। आज देश में कोई भी सामाजिक या धार्मिक संस्था यदि बड़े पैमाने पर चंदा (डोनेशन) इकट्ठा करती है, तो उसे 'सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट' या 'पब्लिक ट्रस्ट एक्ट' के तहत खुद को पंजीकृत करना होता है। लेकिन आरएसएस आयकर अधिनियम के तहत केवल एक अनौपचारिक समूह यानी 'बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स' (Body of Individuals) के रूप में पंजीकृत है। आलोचकों का तर्क है कि बिना किसी केंद्रीय कॉर्पोरेट या वैधानिक पंजीकरण के इतने बड़े पैमाने पर देशव्यापी गतिविधियों का संचालन करना आम संस्थाओं के साथ अन्याय है, जिन्हें मामूली कमियों पर भी सरकारी नोटिस का सामना करना पड़ता है।
2. 'गुरु दक्षिणा' और वित्तीय पारदर्शिता का अभाव
आरएसएस का मुख्य वित्तीय स्रोत उसके स्वयंसेवकों द्वारा दी जाने वाली 'गुरु दक्षिणा' है। आयकर अपीलीय न्यायाधिकरणों (ITAT) ने अतीत में इसे कर-मुक्त माना है। हालांकि, तीखी आलोचना इस बात को लेकर होती है कि बिना किसी स्वतंत्र ऑडिट या सार्वजनिक वित्तीय विवरणी (Financial Disclosure) के, हर साल करोड़ों रुपये के इस वित्तीय लेन-देन की वास्तविक निगरानी कैसे संभव है? जब देश 'ब्लैक मनी' और अज्ञात स्रोतों से मिलने वाली फंडिंग के खिलाफ सख्त कानून बना रहा है, तब देश के नीति-निर्धारण को प्रभावित करने वाले एक विशाल संगठन के खातों का सार्वजनिक न होना पारदर्शिता के सिद्धांतों के खिलाफ माना जाता है।
3. ऐतिहासिक भूमिका पर विवाद और विरोधाभास
आलोचकों का एक बड़ा वर्ग आरएसएस की ऐतिहासिक भूमिका पर भी लगातार प्रहार करता आया है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान संगठन की नीति और आजादी के बाद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के बाद लगे प्रतिबंधों (1948) का इतिहास आज भी राजनीतिक बहसों के केंद्र में रहता है। यद्यपि 1949 में प्रतिबंध हटाने के लिए सरकार के दबाव में संगठन ने अपना एक लिखित संविधान तो स्वीकार किया, लेकिन उसने खुद को कभी भी एक औपचारिक विधिक इकाई (Legal Entity) के रूप में पंजीकृत नहीं कराया। इसी विरोधाभास के कारण इस पर समय-समय पर 'गुप्त कार्यप्रणाली' चलाने के आरोप लगते रहे हैं।
🏛️ दूसरी ओर: संगठन का पक्ष और कानूनी स्थिति
दूसरी तरफ, संघ के विचारकों और समर्थकों का तर्क है कि भारत का संविधान (अनुच्छेद 19(1)(c)) नागरिकों को बिना पंजीकरण के भी एसोसिएशन या संघ बनाने की स्वतंत्रता देता है। संघ का कहना है कि वे सरकार से कोई वित्तीय सहायता या सब्सिडी नहीं लेते और न ही कोई व्यावसायिक गतिविधि करते हैं, इसलिए उन पर पंजीकरण की कानूनी अनिवार्यता लागू नहीं होती। संघ के अनुसार, उनके द्वारा संचालित स्कूल, सेवा भारती जैसे एनजीओ और अन्य अनुषंगी संगठन पूरी तरह से अलग-अलग ट्रस्टों के माध्यम से पंजीकृत और ऑडिटेड हैं। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी इन मांगों को राजनीति से प्रेरित करार देते हुए खारिज कर दिया है।
निष्कर्ष: कानूनी रूप से भले ही आरएसएस खुद को 'बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स' के सुरक्षित दायरे में बनाए रखने में सफल रहा हो, लेकिन एक स्वस्थ लोकतंत्र में जब कोई संगठन देश के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य पर इतना गहरा एकाधिकार रखता हो, तो उसकी वित्तीय और वैधानिक पारदर्शिता को लेकर उठने वाले जन-सवालों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
