नक्सलबारी में लाल बलुआ पत्थर के मूर्तियों का समूह सड़क के किनारे खड़ा है, जो एक खून से लिखी गई इतिहास की कुछ ही स्पष्ट स्मृतियों में से एक है।
इन मूर्तियों के साथ ही यहां की सड़कों पर प्रगतिशील लेखक चारु मजूमदार की तस्वीरें भी लगी हुई हैं।
चारु मजूमदार ने 1967 में नक्सलबारी में एक किसान आंदोलन का नेतृत्व किया था।
उनके नेतृत्व में किसानों ने जमींदारों और सरकार के खिलाफ विद्रोह किया था।
लेकिन इस आंदोलन को दबाने के लिए सरकार ने कठोर कदम उठाए और कई किसानों को मार दिया गया।
इस घटना के बाद से नक्सलबारी को भारत का पहला नक्सली विद्रोह माना जाता है।
