वॉशिंगटन/बीजिंग। अमेरिका ने चीन की कुछ सबसे बड़ी कंपनियों पर शिकंजा कसते हुए ई-कॉमर्स दिग्गज Alibaba, सर्च इंजन कंपनी Baidu और इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता BYD को आधिकारिक तौर पर "Chinese Military Companies" (चीनी सैन्य कंपनियों) की सूची में शामिल कर दिया है। इस फैसले ने अमेरिका और चीन के बीच चल रही तकनीकी और आर्थिक प्रतिस्पर्धा को और तेज कर दिया है।

अमेरिकी रक्षा विभाग (Department of Defense) द्वारा जारी सूची में कई अन्य चीनी कंपनियों को भी शामिल किया गया है। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि ये कंपनियां प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चीन की सैन्य-नागरिक फ्यूजन (Military-Civil Fusion) रणनीति से जुड़ी हुई हैं।

क्या है 'Chinese Military Companies' सूची?

यह सूची अमेरिकी कानून William M. Thornberry National Defense Authorization Act 2021 की धारा 1260H के तहत तैयार की जाती है। इसका उद्देश्य उन चीनी कंपनियों की पहचान करना है जिनका संबंध चीन की सेना, रक्षा उद्योग या सैन्य तकनीकी विकास कार्यक्रमों से माना जाता है।

अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि चीन की Military-Civil Fusion नीति के तहत निजी कंपनियों, शोध संस्थानों और उद्योगों की तकनीकी क्षमताओं का उपयोग सैन्य उद्देश्यों के लिए भी किया जा सकता है।

Alibaba, Baidu और BYD पर क्या आरोप?

अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुसार, इन कंपनियों के चीन के उद्योग एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MIIT) तथा कुछ सरकारी संस्थाओं के साथ संबंध हैं। इसी आधार पर इन्हें Military-Civil Fusion Contributors के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

हालांकि, कंपनियों ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।

Alibaba ने कहा है कि वह किसी भी प्रकार की सैन्य कंपनी नहीं है और न ही किसी सैन्य-नागरिक फ्यूजन कार्यक्रम का हिस्सा है। कंपनी ने कानूनी कार्रवाई की संभावना भी जताई है।

वहीं BYD ने कहा कि अमेरिकी निर्णय से अमेरिका में उसकी व्यावसायिक उपलब्धियों को नुकसान पहुंचेगा।

चीन ने जताया विरोध

चीन के विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी कदम को "अनुचित दमन" करार दिया है। बीजिंग का कहना है कि अमेरिका राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर चीनी कंपनियों को निशाना बना रहा है और मुक्त व्यापार के सिद्धांतों का उल्लंघन कर रहा है।

चीन ने वॉशिंगटन से इस फैसले पर पुनर्विचार करने और "गलत नीतियों को सुधारने" की मांग की है।

कंपनियों पर क्या होगा असर?

फिलहाल इस सूची में शामिल होने का अर्थ सीधे प्रतिबंध लगना नहीं है। लेकिन 2027 से अमेरिकी रक्षा विभाग इन कंपनियों से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से सामान और सेवाएं नहीं खरीद सकेगा।

इसके अलावा अमेरिकी कांग्रेस के कुछ सदस्य इन कंपनियों को अमेरिकी शेयर बाजारों से डीलिस्ट करने की मांग भी कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम वैश्विक निवेशकों और साझेदार कंपनियों के लिए जोखिम बढ़ा सकता है।

अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा का नया अध्याय

विश्लेषकों का कहना है कि यह केवल कंपनियों का मामला नहीं है, बल्कि अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा है।

एक ओर अमेरिका उन्नत तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर और रक्षा क्षेत्र में चीन के प्रभाव को सीमित करने की कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर चीन भी दुर्लभ खनिजों (Rare Earths) और महत्वपूर्ण तकनीकी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर अपना प्रभाव बनाए हुए है।

भारत पर क्या असर पड़ सकता है?

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती तकनीकी प्रतिस्पर्धा का असर भारत जैसे देशों पर भी पड़ सकता है। भारत एक ओर अमेरिकी निवेश और तकनीकी सहयोग बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर चीन वैश्विक विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

ऐसे में दोनों महाशक्तियों के बीच बढ़ते तनाव से वैश्विक व्यापार, तकनीकी निवेश और आपूर्ति श्रृंखलाओं में नई चुनौतियां पैदा हो सकती हैं।