90 साल पुराने स्कूल पर ताला, सड़क पर बैठीं छात्राएं: क्या शिक्षा से बड़ा हो गया सिस्टम का खेल?
लखनऊ। जिस स्कूल ने नौ दशकों तक हजारों बेटियों को शिक्षा दी, आज उसी स्कूल के गेट पर ताला लटक रहा है। किताबों और कक्षाओं की जगह अब धरना, प्रदर्शन और भविष्य को लेकर चिंता ने ले ली है। राजधानी लखनऊ के नरही स्थित 90 वर्ष पुराने विद्या मंदिर गर्ल्स हाई स्कूल के बंद होने की खबर ने शिक्षा जगत और अभिभावकों को झकझोर कर रख दिया है।
स्कूल बंद होने के विरोध में छात्राएं, अभिभावक और शिक्षक सड़क पर उतर आए। भीषण गर्मी में धरने पर बैठीं छात्राओं की तस्वीरें कई सवाल खड़े कर रही हैं। सवाल सिर्फ एक स्कूल का नहीं है, सवाल उन सैकड़ों बच्चों के भविष्य का है जो अचानक शिक्षा के अधिकार और प्रशासनिक निर्णयों के बीच फंस गए हैं।
"बच्चों का कसूर क्या है?"
अभिभावकों का कहना है कि यदि स्कूल प्रबंधन और प्रशासन के बीच कोई विवाद है, तो उसकी सजा बच्चों को क्यों दी जा रही है? जिन छात्राओं ने नए सत्र की तैयारी शुरू कर दी थी, उनके सामने अब स्कूल, पढ़ाई और परीक्षा को लेकर अनिश्चितता खड़ी हो गई है।
धरने पर मौजूद कई अभिभावकों ने आरोप लगाया कि संबंधित पक्षों ने समय रहते समाधान निकालने की कोशिश नहीं की। नतीजा यह हुआ कि पूरा संकट बच्चों के सिर पर आ गया।
243 छात्राओं का भविष्य अधर में
बताया जा रहा है कि स्कूल बंद होने से सैकड़ों छात्राओं की पढ़ाई प्रभावित हुई है। सबसे बड़ी चिंता उन परिवारों की है जिनके लिए यह स्कूल शिक्षा का प्रमुख माध्यम था। अभिभावक मांग कर रहे हैं कि सरकार और प्रशासन तत्काल हस्तक्षेप कर स्कूल को दोबारा संचालित कराने की व्यवस्था करे।
शिक्षा या प्रशासनिक लापरवाही?
यह घटना एक बड़ा सवाल छोड़ती है—क्या भारत में शिक्षा संस्थान इतने असुरक्षित हो चुके हैं कि दशकों पुराने स्कूल भी अचानक बंद हो जाएं? यदि किसी संस्था को बंद करना ही था तो बच्चों के वैकल्पिक इंतजाम पहले क्यों नहीं किए गए?
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी शिक्षा संस्थान से जुड़े विवादों में सबसे पहले छात्रों के हितों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। लेकिन यहां तस्वीर उलटी दिखाई दे रही है।
सरकार और प्रशासन से जवाब की मांग
धरने पर बैठे लोगों की मांग है कि सरकार तत्काल स्थिति स्पष्ट करे, स्कूल बंद होने के कारण सार्वजनिक करे और छात्राओं की पढ़ाई प्रभावित न हो इसके लिए ठोस कदम उठाए।
90 साल पुराने स्कूल का बंद होना केवल एक संस्थान का बंद होना नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था पर सवाल है जो बच्चों के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर समय रहते समाधान निकालने में असफल दिखाई देती है।
जब छात्राएं स्कूल के भीतर पढ़ने की बजाय सड़क पर बैठकर अपने भविष्य की गुहार लगाने को मजबूर हों, तो यह केवल एक स्थानीय खबर नहीं रह जाती—यह पूरे शिक्षा तंत्र के लिए चेतावनी बन जाती है।